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04 May 2010

Do you know??

आत्मा के सन्दर्भ में यह तो जान पड़ता है कि ये शरीर के साथ मिलकर ही अपनी उपस्तिथि दर्ज कराती है,,,,
यही बात शरीर के सन्दर्भ में भी लागू होती है कि यह आत्मा के बिना सिर्फ एक पदार्थ है जो ज्ञान और दर्शन से रहित है,,,,,,,
इन दोनों का मिलन एक पर्याय को जन्म जरूर देता है.... पर उस पर्याय का वास्तविकता में कोई अस्तित्व नहीं है,,,,,,
ये पर्याय पिता-पुत्र हो सकती है पर आत्मा या पदार्थ--- पिता-पुत्र नहीं हो सकते,,,हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो सकते,,,,स्त्री-पुरुष नहीं हो सकते...इनको वर्गीक्रत नहीं किया जा सकता,,,
सारे गुण और अवगुण आत्मा के ही लक्षण है एवम जिनका विकास और विनाश आत्मा कि पर्यायिक (physical) यात्रा पर यानि आपकी अपनी यात्रा पर निर्भर करता है.....

याद रखो पर्याय कि मांग पदार्थ हो सकते है पर आत्मा कि मांग सिर्फ ज्ञान है

> क्या आपका सांसारिक पदार्थों या क्रियाओं के प्रति होने वाला मोह आत्मा को विकसित करेगा ?
> आप इस पर्याय कि मांग को महत्त्व देते है या आत्मा कि मांग को ?
> क्या आपको लगता है आप विकास कि राह पर चल रहे हैं ?

.......जय जिनेन्द्र....


     जय जिनेन्द्र का अर्थ है , 'जय ' यानी जयवंत रहो , जयवंत हो जाओ ऐसा भी होता है ! जयवंत हो जाओ , विजयी बनो , जिनेन्द्र भगवन के सामान विजयी बनो , जीतने के लिए संसारी प्राणी के पास बहोत कुछ है ,जीतने के जो विषय है वो अन्तरंग में है , विजय किसपर पाना , एक विकारी भाव और दूसरा विकार भाव उत्पन्न करनेवाले पर विजय पाना है !
     
जो संसारी प्राणी दुःख से पीड़ित है उसे जय जिनेन्द्र बोलते है , जिनेन्द्र भगवन ने अपने आत्मा के विकारी भावों को जीतकर संसारी वास्तु को जीत लिया है , वैसे ही दुखी व्यक्ति भी दुःख को जीतकर सुखी हो.....! जय जिनेन्द्र.....

26 April 2010

Raatri Bhojan Ka Tyaag.........!!!!

रात्री भोजनसे हानियां

१ ज्ञानी भगवंत रात्री भोजन को तिर्यंच - नरक का आश्रव व्‍दार कहते हैं|
२ शरीर रोगी,आलसी बनता है और मनमें विकार पैदा होते है|
३ नरक गति असाता वेदनीय आदि अशुभ कर्म बंधते है|
४ तिर्यंच गति में पराधिनता व कत्‍तलखानेमे कट जाना पडता है|
५ ध्यान,आत्मचिंतन,स्‍वाध्याय में बाधा उत्‍पन्‍न होकर स्‍मरण शक्‍ति कमजोर होने लगती है|
६ मानवीय प्रवृत्‍तियाँ तामसिक प्रवृत्‍तियो में बदलने लगती है|
७ पाचन संबधी अनेक रोग पैदा होने लगते है|
८ मधुमेह (डायबेटीस), मोटापा (ओबेसिटी) अँसेडिटी आदि रोग पैदा होने लगते है| इसका मुख्‍य कारण रातमें सुर्य के गर्मी का अभाव है|

रात्री भोजन आरोग्य के साथ वैज्ञानिक, आध्‍यात्‍मिक, सामाजिक एवं परिवारिक दृष्‍टिकोनसे अनुपयोगी (घातक) हैं, हानिकारक है,प्रकृती विरूध्‍द है|

activities:

रात्री भोजन के त्‍यागसे लाभ:

१ जिसका पालन करने से महीने में १५ उपवास का लाभ होता है|
२ प्रतिक्रमण - स्‍वाध्‍याय - ध्‍यान आरामसे हो सकते है|
३ आत्मा अनेक पापोंसे बच जाती है|
४ मै जैन हूँ, ऐसे गौरव की अनुभूति होती है|
५ मनुष्‍य भव पाप करनेके लिये नही बल्‍कि पुण्‍य करनेके लिये मिला है|
६ रातके वक्‍त भोजन में जू, गिरने से जलोदर,मक्‍खीसे उल्‍टी, चींटीसे बुध्‍दि का नाश, मकडी के जाल से कोढ, विषौले जन्‍तुऔंकी लारसे मृत्‍यू, लकडी की फांस आनेसे तलवा छिद जाता है, बाल आनेसे स्‍वरभंगसे उल्‍टी व दस्‍ते होती है| शरीर अस्‍वस्‍थ होकर आलस बढता है|

८४ लाख योनि में जन्‍म - मरणका चक्र चलता रहेगा|अज्ञान पाप कारक है ज्ञान पाप निवारक है|ज्ञानी बनिये पाप छोडीये| धर्म आदरीये यही एकान्‍त मुक्‍ति एवं सुख शांती का श्रेष्‍ठ मार्ग है|

अतः स्‍वास्‍थ प्रेमियों के लिये त्यागने योग्‍य है| इस लिये यथा संभव दिनमें ही सुर्यास्‍त के पहले भोजन करनेका प्रयास करना चाहिये | रात्रि भोजन न करना यह जैनियोंकी आज भी पहचान बनी हुई है|अतः इसे बरकरार रखना आप सभी का परम कर्तव्‍य है|