29 April 2010

संसारमें भ्रमित जीव...........!!!!!

संसारी जीव कभी चैन नहीं पाता.अपने मोह;राग द्वेष  के कारण भ्रमित होकर वह अनादिकालसे  दुःख उठा रहा है. वह हिंसा  के कार्य करके अपनेको सुखी समज़ता है .झूठ बोलकर स्वयं को चतुर मानता है .दुसरेके धन हरण करके अपनी शक्ति का प्रतिक मानता  है और परिग्रह की वृद्धि में अपना बड़प्पन समझता है ;जबकि यही पाप प्रवृतिय उसके संसार का कारण है.  

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