27 April 2010

Jay Jinendra....!!!!

(1) अरिहंत नाम लाडू और सिद्ध नाम घी
साधू नाम शक्कर,तू घोल घोल पी||

(2)
दो गोरे दो संवारे दो हरियल दो लाल
सोलह स्वर्ण सामान है, सो बूंदों तिहु काल||

(3)
जब मैं आया जगत मैं,
जगत हँसा हम रोये|
ऐसी करनी कर चले
आगे हंसी ना होए||

(4)
तुम बिन मैं व्याकुल भयो जैसे जल बिन मीन,
जन्म जरा मेरी हरो करो मोहे स्वाधीन||

(5)
जो सोया हो नीद मैं उसे जगाया जाये,
जाग कर जो सो रहा उसको कौन जगाये||

(6)
जो जगत के देव थे मैं पास उनके भी गया,
वे बेचारे खुद दुखी मेरी हरेंगे पीर क्या||

(7)
जिब्या बड़ी उतावली बोले ताल कुताल|
आप बोल भीतर चली थप्पड़ खावे गाल||

(8)
बड़े बड़ाई न करे,बड़े न बोले बोल|
हीरा मुख ते ना कहे,लाख हमारा मोल||

Om Hrim Namh...!!!!

Jay Jinendra

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